देश में चल रहे आईपीएल के बुखार में आप भी बुरी तरह जकड़े होंगे। हो सकता है आप इस भीड़ में शामिल न हों, पर इस आईपीएल ने देश के युवाओं की जो हालत की है वो तो जग जाहिर है। मैं यहाँ खेल की बुराई कतई नहीं कर रहा हूँ पर में तो खेल के तरीके से व्यथित हूँ. हम कहाँ जा रहे हैं, किस चीज का हिस्सा बन रहे हैं, खुद हमें नहीं मालूम. हम बस उस तरह की प्रतियोगिता को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमे सबकुछ पैसे के लिए होता है, जिसमे देश के चंद सौदागरों ने खेल को खरीद लिया है। मन में एक टीस सी उठती है की, बिकने के लिए तो देश में पहले ही काफी कुछ है, कम से कम खेल और खेल की भावना को तो बख्श देते। पर इस से भी दुःख की बात यह है की ये सब खुलेआम बड़े आराम से चल रहा है और सब राजी-राजी इसका आनंद ले रहे हैं। ऐसे ही आँखे मूंदे बैठे रहे तो ऊपरवाला ही जाने आगे इस खेल में और कितने खेल देखने को मिलेंगे!
आईपीएल के नाम से खिलाडियों की बोली लगी ,जिनका क्रिकेट से कोई सरोकार नहीं है उन्होंने मोटी रकम हाथ में लिए खिलाडियों की कीमत तय कर ली। जिन्हें देश का बच्चा-बच्चा अपना रोल मॉडल मानता है वो सरेआम बिक गए ! कभी सोचा है, इस नाटक में शामिल लोगो ने इस तरह खेल और खिलाडियों की बोली लगने का देश के बच्चो में क्या सन्देश जाता होगा? देखिये तो सही खरीददारों ने अपनी-अपनी जेब के हिसाब से देशी विदेशी खिलाडियों को मिला-मिलूकर भानुमती के कुनबे सरीखी टीमे तैयार करली और बाजार में टिकने के लिए आकर्षक नाम दे दिए और हो गया तमाशा शुरू. आयोजक धन की बारिश कर रहे हैं और सब के सब पैसे के लिए खेल रहे हैं। आज यह खेल फ़टाफ़ट नाम और पैसा कमाने का साधन बनता जा रहा है। तभी तो राजनेता भी खेल के अखाड़े में उतर आए हैं, जिनका क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था! कोरपोरेट घराने, खिलाडी, राजनेता सभी के हित देश से ऊपर होते दिखाई दे रहे हैं. सब मिल बांटकर बटोर रहे हैं और लुट रहे हैं हम, तार-तार हो रही है देश की खेल संवेदनाएं।
हमारे देश के अन्दर जब पहले से ही राज्यों की टीमे मौजूद हैं तो नई टीम गठित करना और इसके लिए बाहरी खिलाडियों की जरुरत तो बिलकुल समझ में नहीं आती। हमारे देश में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। राज्यों में अपने क्रिकेट बोर्ड हैं, अपनी टीमे है। कितना अच्छा होता की बिना इस आईपीएल के दिखावे के अपने ही राज्यों की टीमो के बीच सुखद प्रतिस्पर्धा होती. हर राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व हमारी अंतर्राष्ट्रीय टीम के खिलाडी करते। हा थोड़ी कमाई कम होती पर सच मानिए इस से देश की युवा प्रतिभाएं उभर कर आती, उन्हें निखरने का मौका मिलता जो बस आज एक मौके की आस में इन सौदागरों का मूंह ताकती रहती हैं। इस तरह हमारे खिलाडियो के खेल का स्तर बढ़ता और आने वाले विश्वकप में सर्वश्रेष्ठ खिलाडी भारत का प्रतिनिधित्व करते और हमारी दावेदारी मजबूत होती। बड़े दुःख की बात है आज देश की प्रतिभाओं का देश में ही खेलना दूभर हो गया है, अंतर्राष्ट्रिय टीम में चयन तो दूर की बात है और कडवी सच्चाई ये है की ये सब अपनों का ही किया धरा है।
क्रिकेट में धन की बारिश हो रही है चंद देशी-विदेशी खिलाडी, धनी आयोजक और घराने साथ मिलकर नाम, पैसा, शोहरत के मालिक बने बैठे हैं। शीर्ष पर बैठे इन लोगो के दोनों हाथ घी में और सर कढाई में हैं वही दूसरे खेल और खिलाड़ी ख़ाक छान रहे हैं, हमारा राष्ट्रीय खेल गुमनामी के अँधेरे में डूबता जा रहा है. हॉकी की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है, यही हाल कमोबेश अधिकतर खेलो का है। शाहरुख हॉकी पर फिल्म बनाते हैं, नाम, पैसा, स्टारडम, सहानुभूति, और खूब वाहवाही लूटते हैं पर वास्तविकता में क्रिकेट के साथ हो लेते हैं। हमारे पडोसी देश के खिलाडियों को आईपीएल में शामिल न किये जाने के दर्द का अहसास उन्हें है, पर जिस खेल पर उन्होंने पूरी फिल्म बना डाली उसकी गिरती दशा पर कोई प्रतिक्रया नहीं! उल्लेखनीय है की हमारे देश में दर्शक परदे पर दिग्गज अभिनेताओं की प्रस्तुति को काफी गंभीरता से लेते हैं और अभिनेता को उसके साथ जोड़कर देखते हैं। पर उगते सूरज को सलाम तो दुनिया का दस्तूर है और ऐसा करने वाले अकेले शाहरुख ही तो नहीं हैं।
सब से जादा तो मैं मीडिया के खिलाफ हूँ। कहने भर को लोकतंत्र का तीसरा स्तम्भ है पर देश की वास्तविक समस्याओं से पल्ला झाड रखा है। इन्हें बस लम्बी चलने वाली मिर्च मसालेदार खबर चाहिए। टीआरपी बटोरने के लिए बेतुके मुद्दों को तूल देना जगजाहिर है। वैसे तो आपके साथ खुलकर इस दर्द को बाँटना चाहता हूँ पर अभी बात क्रिकेट के बारे में ही करते हैं. मिडिया हमेशा क्रिकेट खिलाड़ियों को सुर्ख़ियों में रखता है। आप सवेरे देश-दुनिया की ख़बरों के लिए टीवी चालु कीजिये आपको मुख्य खबर सुनाई देगी--- आखिर क्या है धोनी का पहला प्यार???, कही कोई क्रिकेटर हसीनाओं के साथ कमर में हाथ डाले थिरकता नजर आएगा तो किसी के अफेयर का ताजा-तरीन मामला देख आप अपना सर पीट लेंगे।
हमारी तो पूरी व्यवस्था में ही खोट है। खेल मंत्रालय कहने भर को ही है। खेल संघो, गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए अनेक कानून बने पर कागजों में ही रह गए। देश के युवा भी क्रिकेट की अन्धेर्गिर्दी और दूसरे खेलो की बेकद्री में दोषी हैं, ये बस भीड़ में शामिल होना जानते हैं और खेल भी इन के लिए मनोरंजन के माध्यम से ज्यादा कुछ नहीं है। ये अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से इतर कुछ नहीं सोचते. यहाँ कुछ पंक्तिया याद आती हैं......
बर्बाद गुलिस्ता करने को बस एक ही उल्लू काफी है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ता क्या होगा??
ऊपर जो भी आपने पढ़ा उसे पढ़कर आपको मेरे दुःख का अहसास हो गया होगा। क्या आप और हम मिलकर खेल और खेल के स्तर में कुछ सुधार नहीं कर सकते?...............