Monday, December 22, 2014

मेरा खत Mark Zuckerberg के नाम

डीयर ब्रदर मार्क जकरबर्ग आपने बेहतरीन प्लेटफार्म दिया पूरी दुनिया के लिए, दोस्त बनाने का, अपनापन जताने का, अपनी कहने का और दूसरों की सुनने का... आप जानते हैं, ऐसे समय में जब हर कोई कहता मिल जाएगा..... टाइम नहीं है-टाइम नहीं है...... और ऐसे में भी लोग जिंदगी का सबसे ज्यादा टाइम फेसबुक को दे रहे हैं इसी से इसकी अहमियत और लोगों में इसके प्रति दीवानगी का पता चलता है. मैं आपका शुक्रगुजार हूँ कि आपने सारी दुनिया को एक मंच पर ला दिया है.....
मैं आपको ये खत अपनी और अपने तमाम साथियों की ओर से लिख रहा हूँ.....
काफी समय से फेसबुक के मैसेज बॉक्स में मुझे लगातार मेरे साथी Messages भेज रहे हैं जो मेरी फ्रेंड्स-लिस्ट में आना चाहते हैं, पहले कई साथियों को Reply किया कि मैं असमर्थ हूँ, मार्क जकरबर्ग ने मेरे हाथ बाँध रखे  हैं, 5000 से ऊपर जाने नहीं देते, request accept या send  करने नहीं देते... कभी कुछ मित्रों को अपने page  का लिंक भी भेजा कि आप यहाँ मेरे साथ जुड़ सकते हैं या आप प्रोफाइल पर ही मेरे follower बन सकते हैं, यहां भी आप इतने ही मेरे साथ जुड़े हुए हैं जितनी कि लिस्ट में होकर। लेकिन कई साथियों को अपनेपन का अहसास नहीं हुआ, यकीन मानिए यदि कंट्रोल मेरे हाथ में होता तो किसी दोस्त को बुरा नहीं मानना पड़ता ना ही दोबारा बोलना पड़ता....
स्क्रीन पर दायीं तरफ लिखा आता है 'People You May Know' लेकिन इसी आशा में request send कर दी तो फेसबुक की मनाही आ जाती है ये जताते हुए कि शर्मा जी आपकी लिमिट पूरी हो चुकी है अब नहीं बना पाएंगे नए मित्र! ऐसी असुविधाएं मुझे ही नहीं बहुत से साथियों को फील होती हैं....
वर्ष 2004 में जब फेसबुक अस्तित्व में आया विश्व की जनसंख्या 6.4 billion थी जो आज 2014 में लगभग 7.2  billion हो गई है.. फेसबुक के यूज़र्स दिन-दूने रात चौगुने बढ़ते-बढ़ते आज तकरीबन 1.35 billion (monthly active Facebook users) बताए जाते हैं। फेसबुक के employees  जो 2004  में 7 थे, 2005  में 15  2006  में 150  इसी तरह बढ़ते-बढ़ते अब September 30, 2014 को  करीब 8,348 हो गए हैं। 
34 इंटरनेशनल ऑफिस और 4  डेटा सेंटर के साथ साल-दर-साल फेसबुक का रेवेन्यू भी बढ़ता गया, अपना बिजनेस, अपनी लोकप्रियता, लोगों तक अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए फेसबुक का बखूबी इस्तेमाल कर लोग, कम्पनी, सेलेब्रिटी और संस्थान दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं। 
बस एक थोड़ी सी शिकायत है सब बढ़ा, यूज़र्स बढे, कर्मचारी बढे, ऑफिसों की संख्या बड़ी, रेवेन्यू बढ़ा, फेसबुक पर मनोरंजन बढ़ा, नित-नए ऑप्शंस भी बढे, समय के साथ सुधार भी दर्ज होते रहे पर फेसबुक फ्रेंड्स की संख्या 5000 से आगे नहीं बढ़ाई जा रही है, हालांकि  followers का ऑप्शन जोड़कर नए जुड़ने की चाह रखने वालों को राहत आपने दी लेकिन क्या करें सुकून नहीं मिला!!! हमारे देश में लोग दिल में बसने की ख्वाहिश रखते हैं और फेसबुक के फ्रेंड्स की चाहत तभी पूरी होती है जब वो आपकी फ्रेंड्स लिस्ट में हों न की फॉलोवर्स की लिस्ट में। ये तो ऐसा लगता है जैसे दूर की रिश्तेदारी हो या शादी के कार्ड पर सपरिवार न लिखा हो और एक ही जन शामिल हो पाए.... फॉलोवर्स जैसा ही कुछ हाल फेसबुक पेज का है, प्रशंसक से कहीं ज्यादा अपनेपन का अहसास दोस्त बनकर होता है.... आप समझ रहे हैं न मेरा कहने का मतलब!  सेलेब्रिटी लगने से ज्यादा अपना साथी लगने का अहसास मायने रखता है.... लिस्ट में शामिल होने की ख्वाहिश रखने वालों को जितना बुरा न शामिल होकर लगता है उससे कहीं ज्यादा मुझे add न कर पाने पर महसूस होता है....

इसका एक ऑप्शन हो सकता है कि पुराने मित्रों को हटाकर नए जोड़ लिए जाएं लेकिन फिर क्या ये पुराने साथियों के साथ गलत नहीं होगा और अपने मित्रों की संख्या को कम करना चाहेगा भी कौन.... लम्बे समय से निष्क्रिय दिख रहे लोगों को छंटनी कर हटाया भी जा सकता है लेकिन इतनी मशक्कत कौन करे! अब हम फेसबुक पर छंटनी करें या साथियों से गुफ्तगू!!! 

और कई लोग तो संख्या को कम करना भी नहीं चाहेंगे....! संख्याबल के सहारे शक्तिप्रदर्शन की चाह में तो एक राष्ट्रीय पार्टी भी मिस्डकॉल के जरिये सदस्य्ता अभियान चला रही है जिसका फंडा ये है कि एक बार कॉल कर दी तो कर दी फिर व्यक्ति जीवनपर्यन्त गिनती में शामिल कर लिए जाएंगे चाहे बाद में दल बदले, दिल बदले, दिमाग बदले या फिर उनका मन बदले....एक नंबर पर उसकी एक छूटी हुई घंटी कॉलर को लिस्ट में शामिल कर देगी, उसे याद भी नहीं रहेगा लेकिन वो आकड़ों में योगदान करता रहेगा भले ही बाद में कहीं और योगदान कर रहा हो! ये वनवे ट्रैफिक है जिसमें सिर्फ जाने का रास्ता है वापस आने का नहीं.... 

प्रिय भाई मार्क अपने यूज़र्स की सहूलियत, सुकून और जरूरतों को समझते हुए उम्मीद है आप फेसबुक के मित्रों की संख्या में इज़ाफ़ा करेंगे. बात पर ध्यान दीजिएगा ये शायद फेसबुक यूज़र्स की सबसे बड़ी डिमांड है.....!

Saturday, December 20, 2014


हमारी रेल......


हमारे देश में रोजाना लोग अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए, लाखों 
लोग नौकरी-पेशा, काम-रोजगार और आवागमन के लिए इस शहर से उस शहर का सफर तय करते हैं और इस सफर में उनको मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अक्सर भारतीय रेल के कंधों पर ही बैठती है। 

भारतीय रेलें दिन भर में जितनी दूरी तय करती हैं, वह धरती से चांद के बीच की दूरी का लगभग साढ़े तीन गुना है। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क्स में से एक और दुनिया की सबसे सस्ती रेल सेवाओं में शुमार भारतीय रेल पूरी तरह से सरकार के अधीन है। लेकिन आराम की सवारी की अपनी पहचान और रियायती सफ़र के हिसाब से अब यह बीते दिनों की बात होती जा रही है....

करीब 6 महीने पहले केंद्र में सरकार बदली, महंगाई पर वार की उद्घोषणा करती आई वादों और दावों के अम्बार वाली स्वप्नमयी सरकार ने  रेल बजट से कुछ दिन पहले ही रेल मालभाड़े में करीब 6.4 फीसद और रेल किराए में करीब 14.2 फीसद की वृद्धि का ऐलान कर दिया। वृद्धि को नैतिक और उचित स्वरुप का चोला ओढ़ाने के लिए तत्कालीन रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस संदर्भ में संस्कृत का यह श्लोक पढ़ा---- 
'यत्तदग्रे विषमिव परिणामे अमृतोपमम’’।
                                 अर्थात---- दवा खाने में तो कड़वी लगती है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। देशवासियों को एक और स्वप्न दिखाया कि अब रेल यात्रा अप्रतिम होगी तमाम सुख-सुविधाओं से लैस यात्रा में उच्च गुणवत्ता का भोजन यहां मिल सकेगा, भविष्य में रेल में परेशानी नाम की चीज नहीं रहेगी... और इन तमाम बातों के साथ बढ़ा हुआ किराया उसी जनता पर लाद दिया गया जिसके महंगाई के बोझ तले दबने की चिंता में चुनाव पूर्व विपक्ष आधा हुआ जा रहा था.…। 
बढ़े हुए किराए और सुविधाओं के तमाम दावों के बावजूद रेल में सफ़र के दौरान खाने को लेकर यात्रियों की शिकायतें मिलती रही हैं। कभी खाने में छिपकली तो कभी कीड़े-मकोड़े।  23 जुलाई को कोलकाता राजधानी में भोजन में कॉकरोच पाया गया था। जांच में ट्रेनों में खराब गुणवत्ता का भोजन पाना सामने आया.... 

दिवाली के समय में जब रेल यात्रियों की भारी भीड़ थी, एक अक्टूबर  से आंशिक तौर पर गतिशील किराया प्रणाली को लागू करते हुए 80 ट्रेनों के तत्काल कोटे के आधे टिकट महंगे कर दिए गए, नई सरकार ने रेल किराए में बढ़ोतरी जिन दावों के साथ की उनकी हकीकत जब-तब बयान होती रही और दिवाली के अवसर पर प्रबंध कितने कारगर हैं यह भी खुलकर सामने आ गया जब त्यौहार मनाने की उम्मीद में कन्फर्म टिकट बावजूद यात्री टॉयलेट में सफर करने को मजबूर दिखे, क्योंकि डिब्बे में इतनी भीड़ हुई कि वे कई यात्री अपनी सीट तक नहीं पहुंच पाए। कन्फर्म टिकट के बावजूद जो लोग स्लीपर डिब्बे में नहीं जा सकते थे, उनमें से कई यात्री एसी डिब्बों में यात्रा कर रहे थे और ये आरोप भी लगे  कि कर्मचारी पैसे लेकर मजबूर लोगों को एसी डिब्बे में बिठा रहे थे। रेलवे ने बजाय कोई समाधान निकालने के अपने हाथ खड़े कर दिए और लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया। त्योहारों के मौसम में ट्रेन टिकटों के दाम ऐसे बढे, जैसे हवाई जहाज के टिकट हों और जिस दलील के साथ किरायों में बढ़ोतरी हुई कि सुविधाओं में बेहतरी होगी, दलालों से मुक्ति मिलेगी, लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। एक ही टिकट के लिए कोई कुछ दाम दे रहा था तो कोई कुछ और। 

अभी सुनने में आ रहा है, अगले साल के शुरू में रेल यात्रा महंगी हो सकती है। और फरवरी में पेश होने वाले रेल बजट में ऊर्जा की बढ़ती लागत का बोझ यात्रियों पर डालने के लिए रेल किरायों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया जा सकता है।  रेलमंत्री सुरेश प्रभु के अनुसार कुछ बोझ तो लोगों को उठाना होगा। लोगों  पर थोपा जाना कहाँ तक ठीक है वह भी तब जब सरकार महंगाई की मार पर वार करने के लिए सत्ता में आई है और दूसरी तरफ पूर्व में किराए में हुई आशातीत वृद्धि के बावजूद कोई सुधार नज़र नहीं रहे हैं... 

अब एक बार फिर छुटियों के दौर में जेब पर अटैक के लिए तैयार हो जाइए, क्रिसमस और नई साल को एन्जॉय करने के लिए घर से दूर जाना बड़ा महंगा पड़ने वाला है, अच्छे इंतजामों की गारंटी तो कौन लेगा वो अलग बात है...  विंटर ब्रेक के लिए भारतीय रेल सात नई प्रीमियम स्पेशल ट्रेनों के साथ तैयार है जिनमें टिकट बुक कराने के लिए यात्रियों को कुछ ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे, क्योंकि इनका किराया डायनमिक फेयर प्राइसिंग के आधार पर तय होता है। और एक बार कन्फर्म मिली टिकट को कैंसिल नहीं करा सकते, जब तक ट्रेन ही किसी वजह से रद्द न हो जाए। अपग्रेडेशन जैसी सुविधा इनमें नहीं है न ही कोई छूट या रियायत यात्रियों को मिलने वाली है...
तत्काल कोटे की आधी टिकटों के लिए डायनेमिक फेयर सिस्टम के तहत ऊंची कीमतें तय कर दी  गयी हैं, जिससे न सिर्फ गरीबों को  बल्कि मध्यम वर्ग को भी काफी परेशानी होती है उसका पूरा बजट गड़बड़ा जाता है। तत्काल टिकटों की व्यवस्था अंतिम समय पर यात्रा का फैसला करनेवालों की सहूलियत के लिए शुरू की गई थी, जिसका लाभ सभी वर्गों के यात्रियों को मिलता था।  लेकिन जिस तरह से मुनाफे के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है यह एक तरह से मजबूरी का फायदा उठाना ही है।

यदि रेलवे घाटे में चल रही है, उसे राजस्व जुटाना है, तो उसके लिए जरूरी नहीं कि यात्रियों पर इतना बोझ लाद कर उस घाटे को पूरा किया जाए इसके लिए रेलवे के सिस्टम में सुधार किया जाना चाहिए, बिना टिकट यात्रा करने वालों पर लगाम लगाई जानी चाहिये, रेलवे को चूना लगा रहे दलालों पर अंकुश हो, ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें हम सब जानते हैं और आए दिन उस हकीकत से दो-चार होते रहते हैं जिनसे रेलवे घाटे में रहता होगा..... 

60 हजार करोड़ की लागत से 500 किमी की दूरी पर बुलेट ट्रेन चलाने की बात करके हम भले ही विश्वस्तरीय होने का ख्वाब देख सकते हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि रोज 2  करोड़ तीस लाख यात्रयों को यात्रा कराने वाली, हर दिन 30  लाख टन माल की धुलाई करने वाली और करीबन 13  लाख कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराने वाली हमारी हमारी रेल प्रणाली करोड़ों देशवासियों के लिए सुकून भरी, सुरक्षित और विश्वसनीय हो तथा हर वर्ग की पहुँच बनी रहे... ट्रेनों में सफाई और व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी भी है, जिसके लिए नियमों का पालन करना और करवाया जाना बेहद जरूरी है...

रेल यात्रा हम सभी ने की है। शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने रेल यात्रा न की हो। छुक-छुक रेलगाड़ी क्या बच्चे, क्या बूढ़े सभी को लुभाती है। रेल सबको अपनी से लगती रहे, सुकून की यात्रा का अहसास देती रहे और आम जन की पहुँच में बनी रहे इसके लिए प्रयास जरूरी है ....ताकि लोग सफ़र करें suffer न करें....
जाते-जाते अशोक कुमार के गाने की चंद लाइने आप सभी के लिए जो 'देश का मेल: भारतीय रेल' की बात को बड़े दिलकश अंदाज में दर्शाती हैं....

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
धरमपुर भरमपुर भरमपुर धरमपुर
मैंगलोर बैंगलोर बैंगलोर मैंगलोर
माण्डवा खंडवा खांडवा माण्डवा
रायपुर जयपुर जयपुर रायपुर
तालेगाँव मालेगाँव मालेगाँव तालेगाँव
बेल्लुर वेल्लुर वेल्लुर बेल्लुर
शोलापुर कोल्हापुर कोल्हापुर शोलापुर
हुक्कल डिण्डीगल डिण्डीगल हुक्कल
मस्लिपत्नम मस्लिपत्नम
ऊंगोल निथिगोल निथिगोल ऊंगोल
कोरेगाँव गोरेगाँव गोरेगाँव कोरेगाँव
ममदाबाद अमदाबाद अमदाबाद ममदाबाद
शोल्लुर कोन्नुर शोल्लुर कोन्नुर
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
बीच वाले स्टेशन बोलें
रुक रुक रुक रुक
रुक रुक रुक रुक

Thursday, July 10, 2014

बजट नहीं दिखा मोदीमय


प्रचंड बहुमत के साथ हिन्दुस्तान की सत्ता पर काबिज़ हुई NDA सरकार ने अपने 45 दिन के समय में, 5 साल के कार्यकाल का पहला बजट  देश की जनता के सामने रख दिया। कुछ बातें जो इस बजट में साफ़ दिखाई देती हैं उन्हें आप सभी के साथ बांटना चाहता हूँ।

सबसे पहली बात NDA सरकार के इस बजट में तुष्टिकरण की झलक देखने को मिली, अधिकाँश को कुछ न कुछ दिया जाना (चाहे वो तर्कसंगत हो या न हो, पर्याप्त हो चाहे न हो)  बजट ने किसी को यह कहने का मौक़ा नहीं दिया कि फलां- फलां का बजट में ख्याल नहीं रखा गया। मेरा कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई भी, सरकार से, वित्तमंत्री से या उनके नुमाइंदों से सवाल नहीं कर सकता लेकिन इससे अभिप्राय यह है कि उनके पास जवाब रहे ऐसा प्रबंध उन्होंने बजट में किया है।

बजट में जहां वेतनभोगी वर्ग के लिए आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई गई है, वहीं निवेश पर छूट की सीमा में भी इजाफा किया गया है, लेकिन यह जितने बड़े स्वागत योग्य कदम की तरह लिया जा रहा है उसका उतना लाभ मिलता नहीं दिखता उदाहरण के लिए इनकम पर टैक्स में छूट से 2.5 लाख सालाना कमाने वाले को व्यक्ति को महज 3996 रु प्रतिवर्ष और 40 हजार प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को सालाना महज 5004 रूपये का ही लाभ होगा। टैक्स स्लैब में और ज्यादा छूट दी जानी चाहिए थी, मंहगाई से त्रस्त जनता को राहत देने के लिए जैसा कि सभी उम्मीद कर रहे थे। यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है, जनता के सामने भाषण देते समय बीजेपी के नेताओं ने ही इसे 5 लाख तक किए जाने का तर्क दिया था।

वरिष्ठ नागरिकों के मामले में 3 लाख रुपये तक की सालाना आय को कर मुक्त किए जाने का प्रावधान निश्चित रूप से सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए ही किया है, यह ऐसी पंक्ति है जो अगला बजट आने तक वरिष्ठ नागरिकों के जिक्र के समय दोहराई जाती रहेगी।

बजट में सिगरेट, तंबाकू, पान मसाला, गुटका और शीतेल पेय पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर इन्हें मंहगा किया जाना स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी तारीफ़ किया जाना अतिश्योक्ति होगी क्योंकि हर प्रबुद्ध व्यक्ति जानता है अगर वो बजट बनाता तो इन मदों पर कर बढ़ाए ही जाने थे।

चुनावों से पहले भाजपा FDI की धुर विरोधी रही लेकिन आज रक्षा जैसे अतिमहत्वपूर्ण क्षेत्र और बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी FDI लाए जाने और दो दिन पहले घोषित रेल बजट  में निजीकरण की बात करके बीजेपी ने उस वर्ग के साथ तो खिलवाड़ किया ही है जो इनके तत्कालीन विरोध से प्रभावित हुई होगी। रक्षा में 49% FDI सिरदर्द बन सकती है।

विभिन्न मदों में बजट का प्रावधान भी ट्रिकी है जैसे सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए 200 करोड़ (वैसे इसके  लिए बजट न रखा जाकर उनके नाम से किसी योजना के अंतर्गत बजट रखा जाना देश और जनता के ज्यादा हित में होता) जबकि महिला सुरक्षा के नाम पर 150 करोड़ मात्र, बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ जैसी योजना के लिए महज़ 100 करोड़ का प्रावधान रखा गया है, नदियों को जोड़ने की योजना जिसे बीजेपी वाजपेयी जी के समय का हवाला देते हुए बेहद महत्वाकांक्षी  योजना के तौर पर पेश करती रही उसके लिए 100 करोड़ का बजट प्रावधान है।  मंहगाई  से राहत के लिए 500 करोड़ का अलग से फंड बनाने की क्या जरूरत थी, बजट में ही जनता को राहत दे देते।

जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं, उन्हें बजट में विशेष महत्त्व साफ़ मिलता दिख रहा है, मैट्रो परियोजना का काम तो राजस्थान में भी चल रहा है लेकिन अहमदाबाद (बुलेट ट्रेन के बाद) और लखनऊ में मैट्रो के लिए ही बजट प्रावधान रखा गया है, अब इसे बीजेपी किस तरह तर्कसंगत ठहराती है ये देखने वाली बात होगी।

मंहगाई, भ्रष्टाचार, युवाओं को रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों की बजट में अनदेखी ही की गयी है।

बजट की निराशाजनक शुरुआत (पूर्व सरकार की यथासंभव आलोचना) के साथ ही वित्तमंत्री अर्थव्यवस्था की बदतर स्थिति का हवाला देते रहे, वैश्विक परिदृश्य (ईराक संकट) और घरेलु परिस्थियों (मानसून में देरी, मंहगाई, जमाखोरी आदि)  की आड़ में वे कहते नज़र आए कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं, सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव भी बाजार कि अनिश्चितता को बताता रहा। यह आम आदमी का बजट न होकर पूंजीपतियों का, FDI का बजट है।

कुल मिलाके ये बजट ऐसा किसी भी ऐंगल से नज़र नहीं आता जिसे कि मोदी का विकास बजट कहते हुए प्रचारित किया जा सके।

Sunday, July 6, 2014

निशाने पर मनरेगा



मनरेगा ने देश के ग्रामीण को, गरीब को क़ानून के रूप में काम की गारंटी दी है, 
सरकार को और प्रशासन को उसके लिए जवाबदेह बनाया है। मनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है। यह दुनिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी पहलों में से एक है।  

संसद ने गरीबों के लिए सर्वसम्मति से मनरेगा क़ानून बनाया था और इसके पीछे भावना थी कि जिनको काम की तलाश है, उन्हें यह कानून सरकार से काम प्राप्त करने का अधिकार देता है।  देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा महिलाएं इस क़ानून से लाभान्वित हुईं हैं, यह सही मायने में महिलाओं को सशक्त बनाता है।  इस क़ानून ने एक बेसिक परेशानी 'काम की तलाश में पलायन' को कम किया है और गरीब किसानों, मजदूरों और ग्रामीणों को उनकी स्थानीय जगह पर काम दिलवाकर उन्हें विश्वास देने के साथ-साथ बाहर जाने की समस्या से काफी हद तक निजात भी दिलाई है। मैं मानता हूँ कि कई साथी मेरी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि मनरेगा की वजह से रोजगार की गारंटी मिलने से ग्रामीणों के जीवन में बदलाव आया है, रोजगार के अवसरों में सृजन ने जीवनयापन को सुलभ बनाया है, ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था सुधारने में मनरेगा काफी सहायक भी सिद्ध हुआ है।

'मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 6 जून को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी को खत लिखा है कि क्या मनरेगा को एक्ट यानी कानून की जगह योजना में बदला जा सकता है। ग्रामीण रोजगार को क्यों किसी कानून के सहारे गारंटी की जानी चाहिए और क्या ऐसे रोजगार किसी योजना के जरिये नहीं दिए जा सकते।'  

इस क़ानून को क़ानून के बजाय योजना के रूप में लागू किए जाने का प्रस्ताव मात्र ही उस भावना की ह्त्या होगी जिसके साथ यह क़ानून अस्तित्व में आया।  क़ानून के लागू होने में कमियां होना, उसमें किसी तरह का भ्रष्टाचार पाया जाना उसे ख़त्म करने का उचित तर्क नहीं हो सकता कमियां दूर की जानी चाहिएं, सरकार को जहा-जहां खामियां हैं उन्हें दुरुस्त करना चाहिए लेकिन किसी प्रकार के भ्रष्टाचार के होते, अव्यवस्थाओं के चलते, कमियां पाए जाने की वजह से  इसके मूल स्वरुप में छेड़छाड़ करके गरीब को, ग्रामीण को रोजगार की गारंटी देने वाले इस महत्वपूर्ण क़ानून को समाप्त किए जाने का सुझाव देना अमान्य है, यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है  यह सरकार का न सिर्फ कर्तव्य है बल्कि उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है कि वह व्याप्त तमाम कमियों को दूर करने का प्रयास करे और क़ानून जो भी क़ानून के दायरे में रोजगार प्राप्ति का पात्र है उसे काम दिया जाना सुनिश्चित करे बजाय उसे समाप्त कर देने के ताकि यह इसी तरह आजीविका यानि रोजगार का साधन बना रहे 

रोजगार के लिए इस क़ानून के अस्तित्व में आने से पहले कई तरह की रोजगार योजनाएं देश में थीं लेकिन वे उस उद्देश की प्राप्ति में असमर्थ रहीं इसीलिए इसकी आवश्यकता पडी और यूपीए ने देश के करोड़ों लोगों को गारण्टी के साथ काम का हक़ दिया  

मेरा मानना है कि राजनैतिक विद्वेष की वजह से, या किसी क़ानून में व्याप्त खामियों की वजह से या उसके लागू होने में किसी प्रकार की भी गड़बड़ियों की वजह से उसके मूल स्वरुप को समाप्त किया जाना सर्वथा उन  करोड़ों लोगों के साथ खिलवाड़ और अन्याय होगा जिनके लिए यह आजीविका, जीवनयापन और रोजगार का पर्याय है। आम जन को सीधा लाभ देने से जुड़ी, सामाजिक सुरक्षा से सम्बंधित योजनाओं को निशाने पर लिया जाना अतार्किक है इसका कोई औचित्य नहीं है 

Friday, June 13, 2014

सुराज के 6 माह: मेरे कुछ सवाल...



आज बीजेपी की वसुंधरा सरकार को 6 महीने पूरे हो गए हैं, किसी भी सरकार के लिए 6 महीने का समय पर्याप्त समय होता है, जिसमें वो जनता से किए अपने वादों को पूरा करने की दिशा में कोई कारगर कदम उठाकर यह सन्देश दे सके कि हमने जो कहा था उसे करने की शुरुआत कर दी है आज मैं हमारे प्रदेश की मुखिया वसुंधरा राजे जी से यह जानना चाहता हूँ कि बिजली पानी, चिकित्सा  और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चीख-चीखकर पूर्व सरकार पर आरोप लगाते हुए

पानी मिलता है.....?
बिजली आती है......?
आपके यहां डॉक्टर है......?
हमारी माँ-बहनें और बेटियां सुरक्षित हैं....?  

जैसे सवाल जनता से पूछकर हुंकारे भरवाने वाली साहिबा ने ये सब कमियां दूर कर दी हैं....?
वोट लेने से पहले कहा था मेरी सरकार बना दो गाँव-गाँव में स्वच्छ पीने का पानी दूंगी, 24 घंटे बिजली दूंगी, गाँव-गाँव में डॉक्टर होगा, मेरी माँ, बहन और बेटियां सब सुरक्षित होंगी, दुष्कर्म नहीं होंगे, गलों से चेनें नहीं खींची जाएँगी, मंहगाई कम कर दूंगी और सुराज ला दूंगी।
मुझे कोई तो ये बताए 6 महीने में 100 दिन की कार्ययोजना बनाई, मिशन 25 पूरा किया और समीक्षाओं पे समीक्षाएं कीं लेकिन नतीजा मुझसे ज्यादा आप सब जानते हैं...
पानी के लिए रोज मटका फोड़ प्रदर्शन हो रहे हैं, भीषण गर्मी में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा, बिजली के लिए हाहाकार मचा हुआ है और दुष्कर्मों की संख्या ने इस राजस्थान को शर्मसार कर रखा है, क्या अब भी बोलोगे सुराज आ गया, अच्छे दिन आ गए......???
मेरे प्रदेश की इस जनता ने कितने सपने देखे थे, कितना भरोसा किया था कि महारानी जी मुख्यमंत्री बनेंगी तो सब कुछ बदल जाएगा, आज इस सरकार ने युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों, किसानों सहित पूरे प्रदेशवासियों को धोखा दिया है, अब जनता का ध्यान भटकाने के लिए बजट पर सुझाव मांगे जा रहे हैं कि जनता से पूछकर बजट बनाउंगी और प्रदेश का विकास करुँगी अगले साढ़े चार साल की कार्ययोजना बन रही है लेकिन अब तक 6 महीने में 6 काम भी नहीं किए जो गिनाए जा सकें...


क्या कोई पूछेगा इनसे कि  6 महीने में क्या किया.........????? 

Thursday, December 12, 2013

आखिर क्या दिशा दे रहा है युवा राजनीती को.....?

राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजे एक ओर जहां चौंकाने वाले हैं वहीं दूसरी तरफ ये आत्मंथन और चिंतन का विषय है लेकिन न सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए अपितु यह उस मतदाता वर्ग के लिए भी चिंतन का विषय है जिसने विकास को एक सिरे से खारिज करते हुए सिर्फ एक पार्टी को लगभग पूर्ण जनसमर्थन दिया...

क्या ये एक ऐसा दौर नहीं है जिसमें काम करने वाला राजनीतिक दल, विकास की दूरगामी सोच रखने वाले व्यक्तित्व और उसी दिशा में दिन-रात एक करके राजस्थान जैसे सामान्य प्रदेश को रिफाइनरी, मैट्रो रेल, सोलर हब जैसे अन्य अत्याधुनिक विकास के आयाम प्रदान करने के बाद यह सोचने को मजबूर करे कि क्यूँ उसने सिर्फ मार्केटिंग, पैकेजिंग और बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं सीखा...

यह आत्ममंथन का समय है उस नए मतदाता, युवा वर्ग और कुछ हद तक बुद्धिजीवियों के लिए भी कि क्या वे राजनेताओं को ये दिशा-निर्देश देना चाहते हैं कि वे सिर्फ लच्छेदार बातें करना, बड़े वादे करना भर सीख लें और नकारात्मक राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप का ही सहारा लें और उसके साथ ही हम उन्हें सत्ता में बिठा देंगे... क्या यह राजनीती में इस सोच को जन्म देगा कि पांच साल तुम चुप रहो पांच साल हम चुप रहे, चुनाव आते ही एक-दूजे की बखिया उधेड़ेंगे इत्मीनान से...!!!

क्या सबक लेंगे राजनेता इन चुनावी अभियानों से कि वे यदि सत्ता में हैं तो भविष्य में फिर से जनसमर्थन हासिल करने के लिए उन्हें अपने कार्यकाल में किए गए विकास और जनकल्याणकारी कार्यों के आधार पर, उपलब्ध संसाधनों का आंकलन कर भविष्य के लिए रणनीति बनाते हुए,  भविष्य की सम्भावनाओं के देखकर विकास के दावो और वादों के साथ आने वाले समय में जनसमर्थन मांगने से कोई लाभ नहीं होगा वहीं ऐसे राजनीतिक दल जो कभी अपने काम की तुलना किए बगैर सिर्फ आरोप की राजनीती के जरिये उसमें कामयाब हो जाएं...

मैं पूछना चाहता हूँ नई पीढ़ी से आप सभी की बातें सुनते हैं, वायदे सुनते हैं, हर बात की समीक्षा करने की बुद्धिमता आपके पास है... ऐसा होते हुए भी एक राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा पत्र में 5 लाख रोजगार देने की बात करता है वहीं विपक्ष रहा दल 10 -15  लाख युवाओं को या ये कहें हर युवा को रोजगार की बात करता है तो आप उससे ये क्यूँ नहीं जानना चाहते कि.… 
  • उसका आधार क्या है..? 
  • आखिर उनकी ऐसी कौनसी नीतियां रहेंगी जिनसे ऐसा सम्भव हो पाएगा... 
जब विपक्ष ने महज 6 माह पहले जनता के सामने कमियां गिनाना शुरू किया तो क्या मतदाता का फर्ज नहीं बनता कि वो सोचे और प्रश्न करे कि जब आप वाकई हमारा भला चाहते थे, आप सरकारी नीतिओं से खिन्न थे तो क्यों आप पूरे समय सरकार को आगाह नहीं करते रहे, और आज चुनाव के अतिनजदीक आते ही आपको हमारा साथ चाहिए... 
जबकि हम स्वयं जानते हैं यह सम्भव नहीं है, यहाँ तक कि विकसित देश में भी ये सम्भव नहीं है इससे आज का युवा भलीभांति परिचित है... कांग्रेस ने वायदा किया तो आधार के साथ किया... आज प्रदेश में रिफाइनरी की जो नीव रखी गयी है वह अकेले ही 2 लाख हाथों को रोजगार देगी, मैट्रो रेल परियोजना महज एक नए युग की शुरुआत भर नहीं है इससे भी बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित होंगे... हर हाथ को कोई सरकार काम नहीं दे सकती, जितना सम्भव है किया गया, साथ ही अधिकतम रोजगार के अवसर सृजित हों ऐसे दूरगामी निर्णय लिए गए.. यह राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में इसी तरह है जैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार में दिन-रात काम करके अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी परिस्थितियां देते हैं जिससे उनका भविष्य उज्जवल हो इसी तरह ऐसे अनेक कदम कांग्रेस सरकार ने उठाए जिन्हें पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया जिससे प्रदेश की नई पीढ़ी का भविष्य उज्जवल होगा और उसे न सिर्फ रोजगार मिलेंगे बल्कि स्वयं सशक्त होने के साथ अन्य हाथों को भी काम दे सकेगा... चाहे स्वरोजगार के लिए 150 करोड़ की लागत  से 2.7  लाख युवाओं को निःशुल्क प्रशिक्षण, युवा उद्यमिता प्रोत्साहन योजना के तहत  प्रदेश के नौजवानों को अपने उद्यम के लिए आसान शर्तों पर बड़ी आर्थिक सहायता देना, उच्च शिक्षा के लिए छत्रवृत्तियां, प्रदेश में विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों की स्थापना, विश्व स्तरीय कम्पनियों द्वारा अभूतपूर्व  निवेश की बात की जाए, क्या यह सब हमारे प्रदेश को एक नई पहचान दिलाने साथ ही रोजगार की दिशा में आशातीत अवसरों की सम्भावना नहीं देता है... मगर नहीं आमजन ने उस मध्यम वर्गीय परिवार में बेहतर कल की उम्मीद में संकल्पबद्ध होकर किए जा रहे प्रयासों को नकार दिया और हवा में, बिना किसी आधार के, लुभावने वादों को बिना आंकलन किए जनमत  किसी और प्रदान किया...

चुनाव अभियान में आरोपों का एक मुख्य बिंदु रहा कि सरकार रेवड़ियां बाँट रही है, क्यों पूरे समय विपक्ष ने सरकार पर दबाव नहीं डाला कि अमुक कार्य होना चाहिए और अमुक नहीं..  सभ्य समाज के लोग और दबाव समूह अपने स्तर पर सर्वे करते और जानते जमीनी हकीकत को कि---
  • कितनी जनता मुफ्त दवा चाहती है, निःशुल्क जांच चाहती है... 
  • वृद्धों को, विधवाओं को, बेरोजगारों को पेंशन की और छात्रों को छात्रवृत्ति की आवश्यकता है भी या नहीं,
  • प्रदेश में महिलाएं निःशुल्क प्रसव चाहती हैं या नहीं...
  • गरीब को सस्ता खाद्यान दिया जाना जरूरी है या नही...
  • प्रदेश के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को साइकिल और लैपटॉप मिलने से उनके साथ ही कल के विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिल रहा है या नहीं...
  • किसान बिजली की बढ़ी हुई दरों से बिल चुकाने में समर्थ है या नहीं...
  • बेटी के जन्म को प्रोत्साहन देने के लिए नकद राशि के प्रावधान का आम जन में सकारात्मक सन्देश जा रहा है या नहीं...
ऐसे अनेक बिंदु हैं जिन्हें जमीनी स्तर पर उस वर्ग को आंकना चाहिए था जो आज आलोचना कर रहा है और अपने स्तर पर सरकार को रिपोर्ट देनी चाहिए थी, आइना दिखाना चाइए था कि फलां  योजना की आवश्यकता है और फलां  की नहीं... वैसे भी तो शिक्षा के, स्वास्थ्य के आदि सामाजिक परस्थितियों के आधार पर व्यवस्था की कलई खोलते सर्वे हम आए दिन देखते हैं तो फिर साकारात्मक दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठा... मगर नहीं किसी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई... साथियों जिम्मेदारी महज़  कह देने भर में नहीं बल्कि उसे निभाकर कर दिखाने में है...

आज की नई पीढ़ी के पास हर तरह के आंकड़े उपलब्ध हैं, संसाधन उपलब्ध हैं, उनके पास नई सोच है... मेरा सवाल है कि आप कोई भी निर्णय लेने से पहले तुलनात्मक अध्ययन क्यूँ नई कर पाए...  क्यों यह नहीं देखा गया किसकी सरकार ने कितनी बिजली पैदा की, किसने कितने रोजगार दिए, किसने कितने स्कूल, कॉलेज, सड़कें बनाईं, और सबसे महत्वपूर्ण किसकी सरकार ने न सिर्फ आज को  बल्कि आने वाले  कल को देखते हुए दूरगामी प्रगति के लिए निर्णय लिए... 
आज का युवा कुछ खरीदने से पहले भी इंटरनेट रिव्यूज़, माउथ पब्लिसिटी,अपने ग्रुप में डिस्कसन करने के बाद भी खुद एनालिसिस  कर के नतीजे पर पहुंचता है तो फिर अपना समर्थन हमने सिर्फ बातों में आकर ही दे दिया... हम सिर्फ एक पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को देखकर, उसकी लच्छेदार बातों को सुनकर, अन्य दलों पर लांछन को सुनकर, उसके दिलचस्प अंदाज में खोकर प्रदेश स्तर की वास्तविकता को भूल गए और उस व्यक्ति विशेष के प्रभाव में आकर विकास के लिए दूरगामी सोच रखने वाली और धरातल पर रहकर बात करने वाली सरकार को और व्यक्तित्व को अनदेखा कर दिया, जबकि हम जानते हैं कि हमारे प्रदेश का नेता वह व्यक्ति विशेष नहीं उसकी पार्टी का अन्य कोई दूसरा है... इस बात को इस तरह से लें कि युवा पीढ़ी की सोच रही कि यह व्यक्ति ही सुशासन दे पाएगा और हम इसके नाम पर अपने प्रदेश में किसी को भी सत्ता सौंप रहे हैं, यह स्थिति बड़ी हास्यास्पद है यह तो ऐसा ही है कि हम किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री में अपना प्रतिनिधि देखें और उसके नाम पर किसी को भी अपना समर्थन दे दें क्योंकि दूसरा देश ज्यादा विकसित है, वह व्यक्ति आकर्षक भाषण देता है और सपने दिखाता है...

आज की पीढ़ी जानती है कि हर अर्थव्यवस्था के विकास का एक मॉडल होता है जिसका चुनाव वहाँ की स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और आवश्यकताओं को देखते हुए किया जाता है, यही बात दो प्रदेशों के आंकलन पर भी लागू होनी चाहिए अन्यथा परेडोक्स की स्थिति बन जाती है...

हमको समझना होगा, चिंतन करना होगा और देखना होगा कि हम राजनीतिक दलों को अपनी आम राय से क्या दिशा-निर्देश दे रहे हैं.  अन्यथा  विकास की बातें गौण एवं नकारात्मक हो जाएँगी और हवाई बातों की राजनीती पूरे देश पर हावी हो जाएगी जिसका खामियाजा अंततः हम सबको उठाना पडेगा...