Thursday, July 29, 2010

फिजूलखर्ची या रोजीरोटी.........


इन दिनों शादियों का सीजन जोरों पर है साथ ही इससे जुड़े तमाम प्रकार के व्यवसाय और व्यवसायियों की आजकल पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कढाई में है।

देखा जाए तो जहां एक तरफ शादी समारोह में होने वाले खर्च की राशि करोड़ों और अरबों को छू रही है वहीँ दूसरी तरफ एक पूरे का पूरा तबका भूखे पेट सोने को मजबूर है।

मैं एक साधारण नागरिक की हैसियत से अगर सब से यह प्रश्न करू की क्या ये सब उचित है......? विवाह समारोह में होने वाला बेहिसाब खर्चा, क्या सिर्फ दिखावा मात्र नहीं है.......? क्या यह सिर्फ अपने status और एक वर्ग विशेष को बनाए रखने का रूप नहीं है........?

दोस्तों आपका मन भी शायद यही कह रहा होगा की वास्तव में कहीं न कहीं धन की बर्बादी हो रही है, लेकिन मैं यहाँ यह नहीं कहूँगा की ये सब बंद हो जाना चाहिए, मेरी सोच कुछ जरा हटके है.......।

मुझे लगता है की इसी बहाने ही सही धन्ना सेठों की तिजोरियों में रखा हुआ पैसा बाहर आकर कितनों को रोजगार और रोटी देता है....... कही न कही, किसी न किसी रूप में इन तमाम व्यवसायों से जुड़े हुए मजदूरों को काम देता है। भला हो ऐसे कुबेरों का, जिन्हें अपने कमाए हुए धन का हिसाब तक पता नहीं है, क्योंकि ऐसे तमाम लोग प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से तो परोपकार का काम कर ही रहे हैं.......!

सोच कर देखें की यदि ऐसा बंद हो जाए या सभी सादगी पूर्वक समारोह आदि करने लग जाएं तो इसमें खर्च होने वाला पूरा धन ज्यों का त्यों उनकी तिजोरी या बेंक में पड़ा रहेगा और अर्थव्यवस्था की निरंतरता में बाधक बन जाएगा.......... मेरा मानना है की हममें से शायद ही कोई परोपकार के नाम पर सीधे तौर पर कभी किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था को कोई धन राशि उपलब्ध करवाता होगा। चलो ऐसे ही सही दिखावे और वर्ग विशेष की पहचान को बनाए रखने के लिए ही सही हमें ऐसा करते रहना चाहिए, ताकि हम भी इस पुन्य के काम में भागीदार बन सकें........

जहां तक मुझे लगता है इस पूरी प्रक्रिया में कही न कही स्थानीय प्रशासन को भी प्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए और एक निश्चित राशि से ऊपर होने वाले खर्च पर एक अति न्यूनतम चार्ज सामाजिक कल्याण कर के रूप में आयोजक से वसूल किया जाना चाहिए, क्योंकि ये मामूली राशि आयोजक के लिए तो भारी नहीं होगी लेकिन इससे सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए राशि एकत्रित हो सकेगी और सीधे तौर पर जरूरतमंद के काम आ सकेगी....

Tuesday, July 27, 2010

मेरी एक छोटी सी पहल........................



हम लोगो में एक आदत है की हम उपदेश और सलाह बहुत अच्छी देते हैं और वो भी बिना मांगे.........!!!!! मुझे भी लगा की बातें अब बहुत हो गई, मैंने भी विचारों और भावनाओं के माध्यम से जल को बचाने और संरक्षित करने की दलीलें बहुत दे दी...........

मेरा मन नहीं माना, मुझे लगा की कही कोई कमी है..... इसलिए मैंने तुरंत अपने घर के बीचोबीच घास के बगीचे के लिए जो जगह थी उसको खुदवा डाला, मैंने बहुत सोच-विचार कर बारिश के पानी को संरक्षित करने और रोजाना घरेलु उपयोग में आए हुए जल को धरती के गर्भ में पहुचाने का प्रारूप तैयार किया।

मैने अपने पास उपलब्ध जगह में एक 10*10 फीट चौड़ा और 10 फीट गहराई वाला बड़ा टेंक तैयार किया जोकि नीचे से पूरा पक्का था और इसी के साथ एक छोटा टेंक 3*3 फीट चौड़ा और लगभग 25 फीट गहराई वाला तैयार किया, जोकि नीचे से कच्चा था। अब मैंने दैनिक उपयोग में आए हुए जल के निकास को उस कच्चे टेंक के साथ जोड़ दिया ताकि वो शुद्ध होकर सीधा धरातल में जाता रहे।

और दुसरे वाले टेंक को मैंने पुरे घर के बारिश वाले पानी के निकास-द्वार से जोड़ दिया ताकि बारिश का पूरा पानी उसमे एकत्रित हो सके और साथ ही उसके पुरे भरने के बाद, अतिरिक्त जल का निकास उस कच्चे टेंक के साथ जोड़ दिया, जिस से इसके भरने के बाद बचा हुआ जल भी सीधा जमीन में जाता रहे। मैंने ये महसूस किया की इस तरह करने से जल व्यर्थ नहीं बहेगा और सीधा जमीन में जाकर जल के स्तर की वृद्धि में सहायक होगा।

आज जब बारिश का मौसम है और इस दौरान मेरे घर से पानी ,की एक बूँद भी व्यर्थ बाहर नहीं जाती है तो ये देखकर मेरे दिल को जो सुकून मिलता है उसे मैं बयान नहीं कर सकता, लगता है की मैं अब अपनी भूमिका का निर्वहन वास्तविक और सही रूप में कर रहा हूँ।

मैं चाहता हूँ की मैंने जो छोटी सी पहल की है इसी प्रकार किसी भी रूप में जल को धरती के गर्भ में पहुचाने के लिए आप जो भी प्रयास कर सकते हैं जरुर करें.........




Friday, July 23, 2010

मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश.....


इन दिनों मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की चर्चा चल रही है। अब सामान्य सी बात है की जब परिवर्तन की बात हो रही है तो विरोध भी होगा, विरोध करने वाले कह रहे हैं इसे लागू कर देश के करोडो छोटे दूकानदार, किसान, और कारोबारियों के हक़ पर डाका डाला जा रहा है...

हम देखते आ रहे हैं की जब भी परम्परागत रूप से चली आ रही सोच में परिवर्तन की बात की जाती हैं तो इसी तरह विरोध के स्वर उठने लग जाते हैं। हम बेशक आधुनिक होते जा रहे हैं फिर भी परिवर्तन को स्वीकारने में परेशानी क्यों होती है उदाहरण के लिए एक सामान्य सी बात बताता हूँ जब कंप्यूटर का दौर शुरू होने जा रहा था तो सबने सुना होगा की अब तो ऐसी मशीन आ रही है जो 10 आदमियों का काम अकेले ही निपटा देगी, बाकि सबको काम से निकाल दिया जाएगा, इसकी वजह से हम बेरोजगार हो जाएंगे पर क्या आपको लगता है की ऐसा हुआ.......?


यदि मल्टी ब्रांड रिटेल में बड़ी विदेशी कम्पनियां निवेश करती हैं तो इसका मतलब ये थोड़े ही है की स्थानीय मौजूदा व्यवसाइयों को निकाल बाहर कर दिया जाएगा। ........... किसी नए निवेशक के आने से मौजूदा व्यवसाइयों को हानि होने की बात ही नहीं उठती है क्योंकि आने वाले निवेशक देश में अपने दुकानदार या व्यवसायी थोड़े ही साथ लेकर आते हैं.........! साथ आएगी तो एक व्यवस्थित प्रक्रिया, बेहतर सुविधाएँ, और उत्तम उत्पाद।


आप सब जानते हैं देश में पहले से ही कई विदेशी कंपनियों के आउटलेट्स स्टोर आदि हैं पर आपने वहा अपने ही देश के लोगो को काम करते हुए देखा होगा और साथ में हमें मिल रही हैं बेहतरीन सेवाएं और विश्वसनीय वस्तुएं .... इसी परिप्रेक्ष्य में मैं आपको एक बात बताता हूँ, अगर मौजूदा छोटे दुकानदार, या व्यवसायी उपभोक्ता की पसंद और वस्तु की गुणवत्ता का ध्यान रखते हैं तो उनके व्यवसाय को कोई हानि नहीं होती है, जैसे की जब देश में Reliance Fresh आया तो ठेले पर या परंपरागत रूप से सब्जी और फल बेचने वालों ने सोचा की जब इतना बड़ा व्यावसायिक घराना सुनियोजित तरीके से इस काम को करेगा तो हमारा व्यवसाय तो ख़त्म हो जाएगा, पर क्या ऐसा हुआ....? उसका एकमात्र कारण...... Reliance Fresh ने जो दावा किया की उनके फल और सब्जी सबसे ताजा मिलेंगे, उपभोक्ता को संतुष्ट नहीं कर सका और आज भी आप और हम फल और सब्जियां सब्जि मंडियों और ठेले से लेना पसंद करते हैं न की Reliance Fresh या इस तरह के उपलब्ध अन्य स्थानों से।

यहाँ सरकार को दोष देने का कोई औचत्य ही नहीं है, सरकार द्वारा विविध क्षेत्रों में पहले भी विदेशी निवेश स्वीकार किया जाता रहा है और यह आवश्यक भी है और जहाँ तक उपभोक्ता क्षेत्र की बात है तो सरकार को दोष दिया जाना हास्यास्पद लगता है क्योकि यह प्रतिस्पर्धा का दौर है, आज का उपभोक्ता बहुत विवेकशील है, उपभोक्ता बाजार का राजा है जो उसे उत्तम लगेगा बाजार का सिरमौर वही होगा। इस से उपभोक्ता को उच्च क्वालिटी की वस्तुएं उपलब्ध होंगी। आप सभी इस बात से भलिभांति परिचित हैं की वर्तमान में जीवन स्तर उन्नत हुआ है, एक आम उपभोक्ता की पसंद बदली है, अब उपभोक्ता बेहतरीन उत्पाद के लिए ज्यादा पैसा देने को भी तैयार है, उसे सबकुछ साफ़-स्वच्छ और विश्वसनीय चाहिए। इसके लिए जरुरी है की रिटेल का स्तर बढाया जाए उसमे यदि विदेशी निवेश से बात बनती दिख रही है तो परहेज कैसा.....?

यदि हमें बेहतर सुविधाएँ मिल सकती हैं तो हैं तो अन्य क्षेत्रों की तरह ही आने दीजिये विदेशी निवेश को अपने देश की रोजमर्रा की जरूरतों में, यह हमारे लिए ही तो है। हमें अपना दृष्टिकोण व्यापक करते हुए और परिवर्तनों का स्वागत करना चाहिए।

Monday, July 5, 2010

आज भारत बंद, कल से होगी मंहगाई कम......!



यह सच है की मंहगाई दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, हर चीज के दाम आसमान छूने लगे हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है.................?

आप.......?
हम........?
सरकार......?
या फिर हम सभी.....?
मंहगाई की समस्या के समाधान के लिए भारत बंद एक कारगर उपाय है....! और कल से ही हमें सभी चीजें सस्ती मिलने लगेंगी....! क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं............?

मंहगाई से निपटने के लिए बंद के समर्थकों ने दलगत राजनीती से ऊपर उठकर मंहगाई कम करने के लिए कोई सकारात्मक संभावनाएं तलाशी होती तो कितना अच्छा होता..........

बंद से मंहगाई पर असर पड़े या न पड़े, इस से आप और हम किस कदर प्रभावित होते हैं यह हम से बेहतर कोई नहीं जान सकता। हर आदमी परेशान होता है, लोगो के काम अटक जाते हैं, फिर उस समय हम मंहगाई को नहीं, बल्कि बंद करने वालों को कोसते हैं.......!

इस बंद के बहाने आज देश में जो भी घटा है उस से आप सभी भलिभांति परिचित हैं और यदि नहीं भी हैं तो बंद के नाम पर आज हुए तमाशे से कल सवेरे अखबार के माध्यम से परिचित हो जाएंगे। इन उपद्रवों के बीच मुख्य मुद्दा तो गायब हो गया और उत्पाती एवं उपद्रवी लोगो के वारे-न्यारे हुए हैं। उन्हें मौका मिल गया जोर-जबरदस्ती करने का, बाजार, संस्थान आदि को बंद करवाने का, आवागमन के साधनो को रोकने का, लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करने का, आप ही बताइये क्या ये तरीका सही था...........?

आप और हम यदि सरकारें बनाते और गिराते हैं तो फिर चन्द लोगो की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है की वे पूरे आम जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं........? कब हम लोग एकजुट होंगे और ऐसे उत्पाती एवं उपद्रवी लोगो को अपनी दिनचर्या को थामने से रोकेंगे..............!

इस सबके विपरीत मंहगाई को रोकने के लिए सकारात्मक प्रयास भी किये जा सकते हैं। इस के लिए आवश्यक है की सरकार एवं विपक्ष निजी स्वार्थ को छोड़कर एकजुट हों एवं इस समस्या के समाधान के लिए स्वस्थ रननीति तैयार करें जिसके तहत देश आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो तथा मंहगाई कम हो सके।


Friday, June 11, 2010

यूं रोकेंगे अपराध............!

अब आप खुद ही फैसला करें........

आज सुबह के अखबार की एक हेडलाइन ने मेरे अंतर्मन को झंझोर कर रख दिया। मेरे प्रदेश में हुई एक घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया.................

खबर कुछ इस तरह है की कानून के रखवालों ने 75 साल के एक बुजुर्ग को दोनों हाथ बाँध कर पेड़ पर लटका दिया................ राज उगलवाने का कितना निराला अंदाज है पुलिस का.................................!! क्या इस तरह के अमानवीय कृत्य को बर्दाश्त किया जाना चाहिए?

उस पुलिसवाले को निलंबित करके अधिकारियों ने खानापूर्ति तो कर ली, लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता की इन लोगो के मन में ऐसा नहीं करने का भय क्यों नहीं उत्पन्न होता? जहाँ तक मुझे लगता है इस तरह की खानापूर्ति से इनका कुछ नहीं बिगड़ता तभी तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कानून के रखवाले न्यायपालिका का काम भी खुद ही कर लेते हैं...................! इस बुजुर्ग के ऊपर चोरी का आरोप है और इसका राज उगलवाने के लिए उन्होंने क्या तरीका अपनाया है...! धन्य है ऐसी पुलिसिया सोच................

दूसरी तरफ मेरे हिंदुस्तान का मुजरिम कसाब, जिसने सरेआम लाशें बिछा दी उसकी तीमारदारी में क़ानून के रखवालों ने करोडो रुपये खर्च करवा दिए और उसकी सजा मुक़र्रर करने में इतना समय गवां दिया माना की ये सब एक प्रक्रिया के तहत ही होना था................... तो इस बुजुर्ग के मामले में ये तरीका क्यों अपनाया गया। ऐसे और भी काफी उदाहरण हैं और आप सभी उनके बारे में जानते हैं?

ऐसे अमानवीय कृत्य हों और हम चुपचाप बर्दाश्त कर लें...............?
कब तक चुप बैठें................?
क़ानून के रखवालों के हाथों कानून की धज्जियां कब तक उड़ते देखें..............?
अगर इस तरह के अमानवीय कृत्यों पर हम चुपचाप बैठे रहे तो हमारा कोई धनीधोरी नहीं है...........




Saturday, June 5, 2010

पर्यावरण हमारी जिम्मेदारी....


आओ आज फिर मना लें पर्यावरण दिवस. अपने अपने तरीके से पर्यावरण बचाओ रैली, रन फॉर एन्वायार्मेंट, विचार गोष्ठियां और वृक्षारोपन कार्यक्रम आयोजित कर आज के दिन को सार्थक कर लें!....................

आपकी जानकारी के लिए आपको एक बात बताता हूँ, मैं तकरीबन पिछले 15-20 वर्षों से लगातार पर्यावरण दिवस मनते हुए देख रहा हूँ और प्रत्येक वर्ष इसी तरह के ढेरों आयोजन किए जाते हैं लेकिन मुझे ये समझ नहीं आता है की पिछले 20 साल में लगाए गए पेड़ कहा गए???

इतनी जागरुकता हमने फैलाई इस पर्यावरण को बचाने के लिए पर आज भी यह दिनों-दिन बदतर क्यूं होता जा रहा है???

सरकार ने कितनी सारी योजनाए बनाई, कितना बजट आवंटित किया पर स्थिति जस की तस क्यों है???

अनेको स्वयंसेवी संस्थाएं इस क्षेत्र में कार्यरत हैं फिर क्यों नहीं बच पा रही है धरती???

पर्यावरण को लेकर आए दिन चिंतन बैठकें, अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किए जाते हैं पर कोई सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं निकलता???

हो सके तो आप भी खोजना इन प्रश्नों के जवाब... ये जो लगातार हम बड़ी बड़ी बाते बनाते आ रहे हैं और नाम कमाने के लिए पर्यावरण के नाम पर जो दिखावा कर रहे हैं उसे तुरंत बंद करके व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। अंत में आप से बस यही कहना चाहता हूँ हम वास्तव में पर्यावरण प्रेमी बने और इसके लिए सिर्फ वृक्ष लगाकर संतुष्ट न हों, उनकी सार-संभाल करें, उन्हें इस लायक बनाएं की वे पर्यावरण को सुधारने में अपना योगदान दे सकें।

Thursday, May 6, 2010

साल में सिर्फ एक दिन माँ....

आओ मदर्स डे भी मना लें!!! एक दिन माँ को महान बताकर खुद को महान साबित करने का अपना ही मजा है दोस्तों........... चाहे साल भर हमारी माँ की हमने खैर खबर भी न ली हो, चाहे हमारे पास प्यार से उसके साथ बैठने के लिए दो पल की भी फुर्सत न हो पर अपने यार दोस्तों, रिश्तेदारों को सुबह सवेरे से ही हैप्पी मदर्स डे तो विश कर ही सकते हैं, ताकि कही कोई ये न कह दे की-------------------- "बड़े बिजी हो गए अब तो भाईसाहब, विश करने तक का टाइम नहीं है!" ----------------


बनाने वालों ने दिन फिक्स कर दिए और लोग ठहरे लकीर के फ़कीर....! अपने-अपने फायदे के हिसाब से उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं । इस तरह के दिनों के सहारे किसी के कार्ड बिक जाते हैं और किसी के फूल तो किसी के अन्य उपहार की चीजें , कुछ लोगो की पार्टियां हो जाती हैं और हो गई तसल्ली की चलो मना लिया स्पेशल दिन...!!

अब वो दिन नहीं रहे जब माँ की परिक्रमा को बेटे चार धाम की यात्रा माना करते थे, माँ की एक बात मूंह से निकलने पे द्रौपदी पांचाली बन गई थी. पर आज कहानी बिलकुल अलग है, आज के बच्चो को माँ यदि कुछ पूछना चाहे तो बच्चे कहेंगे, "ये आपके मतलब की बात नहीं है". ये तो आज का ट्रेंड बन गया है. मैंने देखा है कुछ घरो में जब बटवारा होता है और तो बेटे माँ-बाप को भी बाँट लेते हैं, और स्थिति तब ज्यादा दयनीय होती है जब पिता की मौत के बाद माँ बांटी जाती है........ मन में भावनाए नाम की नहीं हैं, ऐसे में ये मदर्स डे का दिखावा समझ में नहीं आता!!! आपको आए तो मुझको जरुर लिखना.



किसी खुशी या प्यार के इजहार, किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने या अपनी किसी भावना की अभिव्यक्ति के लिए साल के एक दिन की क्या जरुरत है???? साल के एक दिन वेलेंनटाईन डे को प्यार जाता दिया, हो गई प्रेम की पूर्ति, एक दिन धरती की फ़िक्र कर ली और पूरा हो गया वर्ल्ड अर्थ डे का औचित्य!! ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। आप ही बताइये खुद को एक दिन में बांधकर कोई फायदा है क्या? पूरे साल उस कर्तव्य का निर्वाह भी होना चाहिए, पौधा लगाने का क्या मतलब जब तक उसकी सार-संभाल ना की जाए.

मेरा तो यही मानना है, की अपनी माँ के प्रति अपने प्यार का इजहार सिर्फ साल के एक दिन क्यों? ये रिश्ता तो जीवनपर्यंत है, जिसे हमेशा प्यार से निभाना है......